बुध महादशा में गुरु अंतर्दशा: फल, अवधि और उपाय
बुध महादशा में गुरु की अंतर्दशा 2 साल 3 महीने 6 दिन चलती है। शिक्षा, धन, संतान और धर्म पर इसका असर, गुरु की स्थिति से बदलते फल और उपाय जानें।
एक नज़र में
- अंतर्दशा की अवधि
- 2 साल 3 महीने 6 दिन
- महादशा के कुल वर्ष
- 17
आपकी बुध महादशा में गुरु अंतर्दशा कब है?
अपनी जन्म तिथि, समय और स्थान दर्ज करें: इस अंतर्दशा के शुरू और समाप्त होने की आपकी अपनी तिथियाँ दिखेंगी। दशा की तिथियाँ जन्म के क्षण में चंद्रमा की सटीक स्थिति से निकलती हैं, और चंद्रमा एक दिन में लगभग 13 अंश चलता है, इसलिए इस जाँच के लिए जन्म समय ज़रूरी है।
बुध महादशा की नौ अंतर्दशाएँ: क्रम और अवधि
बुध महादशा के 17 वर्ष नौ अंतर्दशाओं में बँटते हैं: पहली अंतर्दशा स्वयं बुध की होती है, फिर विंशोत्तरी क्रम चलता है। गुरु की अंतर्दशा इस क्रम में आठवीं है और 2 साल 3 महीने 6 दिन चलती है। इससे पहले राहु की और इसके बाद शनि की अंतर्दशा आती है।
बुध महादशा में गुरु अंतर्दशा की प्रत्यंतर दशाएँ
गुरु की यह अंतर्दशा आगे नौ प्रत्यंतर दशाओं में बँटती है, जो गुरु से ही शुरू होती हैं। हर प्रत्यंतर की अवधि = अंतर्दशा की अवधि × उस ग्रह के महादशा-वर्ष ÷ 120। यहाँ सबसे लंबी प्रत्यंतर शुक्र की (4 महीने 16 दिन) और सबसे छोटी सूर्य की (1 महीना 11 दिन) है।
| क्रम | प्रत्यंतर दशा | अवधि |
|---|---|---|
| 1 | गुरु | 3 महीने 19 दिन |
| 2 | शनि | 4 महीने 9 दिन |
| 3 | बुध | 3 महीने 26 दिन |
| 4 | केतु | 1 महीना 18 दिन |
| 5 | शुक्र | 4 महीने 16 दिन |
| 6 | सूर्य | 1 महीना 11 दिन |
| 7 | चंद्र | 2 महीने 8 दिन |
| 8 | मंगल | 1 महीना 18 दिन |
| 9 | राहु | 4 महीने 2 दिन |
अवधि 360 दिन के दशा-वर्ष से; कैलेंडर तिथियाँ इंजन 365.25 दिन के वर्ष से निकालता है।
उदाहरण: नमूना कुंडली में यह अंतर्दशा
हमारी काल्पनिक नमूना कुंडली (जन्म 1 जनवरी 1990, स्थानीय समय 10:30, नई दिल्ली) के लिए गणना इंजन ने बुध महादशा में गुरु अंतर्दशा की तिथियाँ 3 अगस्त 2055 से 8 नवंबर 2057 निकाली हैं।
ये किसी व्यक्ति की तिथियाँ नहीं हैं; अपनी तिथियाँ ऊपर की जाँच में देखें।
विंशोत्तरी दशा में बुध की महादशा सत्रह वर्ष की होती है, और उसके भीतर गुरु की अंतर्दशा 2 साल 3 महीने 6 दिन चलती है; बुध के 17 वर्षों को गुरु के 16 वर्षों से गुणा करके 120 से भाग दें, तो यही अवधि आती है। क्रम में यह राहु की अंतर्दशा के बाद और शनि की अंतर्दशा से पहले आती है। बुध बुद्धि, वाणी, गणना और व्यापार का कारक है, जबकि गुरु ज्ञान, धर्म, संतान, धन और गुरुजनों का। दोनों का संबंध एक जैसा नहीं है: बुध गुरु को सम मानता है, पर गुरु बुध को शत्रु मानता है। इसलिए यह अवधि व्यावहारिक बुद्धि और गहरे ज्ञान को जोड़ने का अवसर देती है, पर कुंडली में गुरु निर्बल हो तो तर्क और आस्था के बीच खिंचाव भी पैदा कर सकती है।
शास्त्रीय फल और गुरु की स्थिति
बृहत् पाराशर होरा शास्त्र के अनुसार गुरु यदि लग्न, केंद्र या त्रिकोण में हो, कर्क में उच्च का हो या धनु और मीन में स्वराशि का हो, तो इस अंतर्दशा में धन की वृद्धि, राजकीय सम्मान, धार्मिक कार्य, विद्या में सफलता और संतान से सुख मिलता है। गुरु यदि मकर में नीच का हो, बुध से छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो, या पाप ग्रहों के साथ हो, तो अधिकारियों से भय, मन की पीड़ा और धन की हानि देता है। मिथुन, कन्या, धनु और मीन लग्न में ये दोनों ग्रह केंद्रों के स्वामी बनते हैं; इनमें जो ग्रह लग्नेश नहीं है, वह दो केंद्रों का स्वामी होकर केंद्राधिपति दोष से ग्रस्त होता है, इसलिए ऐसी कुंडली में उसका शुभ फल मिश्रित रहता है।
जीवन के किन क्षेत्रों पर असर दिखता है
- शिक्षा और करियर: अध्यापन, परामर्श, कानून, बैंकिंग, लेखन और प्रकाशन के काम में प्रगति; उच्च शिक्षा या शोध पूरा करने का समय।
- धन: गुरु धन का कारक है, इसलिए बचत और स्थायी निवेश के योग बनते हैं, बशर्ते दूसरा और ग्यारहवाँ भाव सहायक हों।
- परिवार: संतान से जुड़े शुभ समाचार, विवाह के प्रस्ताव, और स्त्री की कुंडली में पति से जुड़े विषय सक्रिय होते हैं।
- धर्म: तीर्थ, गुरु से मार्गदर्शन और शास्त्र-अध्ययन में रुचि बढ़ती है।
- स्वास्थ्य: यकृत, वजन और मधुमेह जैसी तकलीफों पर ध्यान दें।
उपाय
गुरु के लिए परंपरा में शिव उपासना, गुरु के बीज मंत्र "ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः" का जप और गुरुवार को चने की दाल, हल्दी या पीले वस्त्र का दान बताया गया है। बुध के लिए विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। शिक्षकों, बड़ों और ब्राह्मणों का सम्मान गुरु को प्रसन्न करता है। पुखराज केवल तभी पहनें जब गुरु कुंडली में शुभ भावों का स्वामी हो। यह वैकल्पिक है और कुछ भी खरीदना आवश्यक नहीं; कोई भी रत्न पहनने से पहले ज्योतिषी से सलाह अवश्य लें। अवधि दो वर्ष से अधिक है, इसलिए इसके भीतर प्रत्यंतर दशाओं और गोचर में गुरु की राशि बदलने से यह पता चलता है कि कौन सा फल किस समय पकेगा। अगली अंतर्दशा शनि की है, इसलिए इस समय मिले अवसरों को अनुशासन से स्थायी रूप देना समझदारी है।