हिंदू पंचांग
आज की तिथि
कृष्ण पक्ष
षष्ठी
Shashthi
आनंददायक — परंपरा में उत्सव, मेल-जोल और शुरुआत से जुड़ी
षष्ठी का महत्व
साहसिक कार्य और विवाद समाधान के लिए अनुकूल मानी जाती है। इसके अधिदेवता कार्तिकेय हैं।
नए कार्य के लिए शुभ: हाँ — यह तिथि नई गतिविधि शुरू करने के लिए अनुकूल मानी जाती है
आज के पंचांग का सार · New Delhi
तिथि
षष्ठी (कृष्ण पक्ष)
नक्षत्र
Revati
योग
Dhriti
करण
Gara
वार
Mangalvaar
सूर्योदय
05:48
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तिथि के 5 प्रकार
नंदा तिथि
आनंददायक — परंपरा में उत्सव, मेल-जोल और शुरुआत से जुड़ी
भद्रा तिथि
स्थिर — परंपरा में संस्कार और महत्वपूर्ण निर्णयों से जुड़ी
जया तिथि
विजयी — परंपरा में साहस और बाधा सुलझाने से जुड़ी
रिक्ता तिथि
रिक्त — परंपरा में बड़ी शुरुआत के बजाय विशेष पूजा से जुड़ी
पूर्णा तिथि
पूर्ण — परंपरा में पूर्णता और फल-प्राप्ति से जुड़ी
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तिथि क्या है?
तिथि हिंदू चंद्र पंचांग का सबसे मौलिक अंग है। तिथि वह समय है जो चंद्रमा को सूर्य पर ठीक 12° की बढ़त पाने में लगता है — औसतन लगभग 23.6 घंटे, यद्यपि चंद्रमा की दीर्घवृत्तीय कक्षा के कारण यह बदलता रहता है। एक पूर्ण चंद्र मास में 30 तिथियाँ होती हैं: शुक्ल पक्ष (बढ़ता चंद्र) में 15 और कृष्ण पक्ष (घटता चंद्र) में 15।
अंग्रेज़ी कैलेंडर के विपरीत, जहाँ दिन 24 घंटे का निश्चित काल है, तिथि एक गतिशील खगोलीय इकाई है। यह किसी भी समय आरंभ या समाप्त हो सकती है। इसीलिए पंचांग उदय तिथि नियम का पालन करता है — स्थानीय सूर्योदय के समय सक्रिय तिथि को उस दिन की तिथि माना जाता है।
तिथि पंचांग के पाँच अंगों में से एक है, साथ में वार (दिन), नक्षत्र, योग और करण। इन पाँचों से किसी भी क्षण की शुभता निर्धारित होती है। पूजा, व्रत और महत्वपूर्ण निर्णयों के लिए शुभ मुहूर्त चुनने में तिथि को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।
हमारा तिथि विवरण Swiss Ephemeris की वास्तविक ग्रह गणना पर आधारित है, जो चयनित नगर के लिए गणना करता है। इसमें आज की तिथि, पक्ष, तिथि का प्रकार और दिन का पंचांग संदर्भ सम्मिलित है — यह आपकी दैनिक पूजा, व्रत और योजना के लिए मार्गदर्शक है।
पंचांग के पाँच अंग — तिथि किस प्रणाली का हिस्सा है
पंचांग का अर्थ ही है ‘पाँच अंग’ — किसी भी क्षण की शुभता इन्हीं पाँच खगोलीय मापों से तय होती है, और तिथि इनमें पहला व सबसे मौलिक अंग है। हर अंग एक अलग खगोलीय संबंध नापता है और उसकी गणना का अपना नियम है:
| अंग | क्या नापता है |
|---|---|
| तिथि (चंद्र दिवस) | चंद्रमा का सूर्य से कोणीय अंतर — हर 12° की बढ़त एक तिथि पूरी करती है, इसलिए एक चंद्र मास में 30 तिथियाँ। यही व्रत, पूजा और संस्कारों का आधार है। |
| वार (दिन) | सूर्योदय से सूर्योदय तक का सौर दिवस — रवि से शनि तक सात वार। प्रत्येक वार का एक ग्रह-स्वामी है और उसी से दिन का स्वभाव जुड़ता है। |
| नक्षत्र | चंद्रमा किस तारा-मंडल में स्थित है। पूरे राशिचक्र को 27 नक्षत्रों में बाँटा गया है और मुहूर्त में तिथि के बाद नक्षत्र देखा जाता है। |
| योग | सूर्य और चंद्रमा के देशांतरों का योग — कुल 27 योग, जो दिन की समग्र शुभता का एक और स्तर बताते हैं। |
| करण | तिथि का आधा भाग — एक तिथि में दो करण होते हैं, कुल 11 करण। बही-खाता, यात्रा जैसे कार्यों में करण देखा जाता है। |
सभी 15 तिथियाँ — प्रकार, महत्व और प्रमुख व्रत
हर तिथि का एक स्वभाव-प्रकार होता है, और यही बताता है कि कौन-सा कार्य किस तिथि पर शुभ है। नीचे शुक्ल पक्ष की पंद्रह तिथियाँ दी हैं; कृष्ण पक्ष में यही क्रम प्रतिपदा से चतुर्दशी तक चलता है और अंत में पूर्णिमा के स्थान पर अमावस्या आती है। प्रकार-चक्र दोनों पक्षों में एक-सा रहता है — नंदा, भद्रा, जया, रिक्ता, पूर्णा — और हर पाँचवीं तिथि पर दोहराता है। रिक्ता तिथियों (चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी) पर नए शुभ आरंभ टाले जाते हैं, पर वही तिथियाँ देव-पूजा और साधना के लिए अत्यंत शक्तिशाली मानी जाती हैं।
| तिथि | प्रकार | किस काम के लिए | प्रमुख व्रत/पर्व |
|---|---|---|---|
| प्रतिपदा | नंदा | उत्सव, नए कार्य व यात्रा | गुड़ी पड़वा, नव संवत्सर |
| द्वितीया | भद्रा | विवाह व सभी शुभ संस्कार | भाई दूज |
| तृतीया | जया | बल व साहस वाले कार्य | अक्षय तृतीया, हरतालिका तीज |
| चतुर्थी | रिक्ता | नए आरंभ टालें; पूजा श्रेष्ठ | गणेश/संकष्टी/विनायक चतुर्थी |
| पंचमी | पूर्णा | विद्या, चिकित्सा व कला | नाग पंचमी, वसंत पंचमी |
| षष्ठी | नंदा | पराक्रम व संघर्ष-समाधान | छठ (षष्ठी), स्कंद षष्ठी |
| सप्तमी | भद्रा | यात्रा व राजकीय कार्य | रथ सप्तमी |
| अष्टमी | जया | पूजा व साधना (शुभ संस्कार टालें) | जन्माष्टमी, दुर्गाष्टमी |
| नवमी | रिक्ता | नए आरंभ टालें; देवी-आराधना श्रेष्ठ | राम नवमी, महानवमी |
| दशमी | पूर्णा | पूर्णता के कार्य, अत्यंत शुभ | विजयादशमी (दशहरा) |
| एकादशी | नंदा | व्रत, दान व आध्यात्मिक कार्य | एकादशी व्रत (विष्णु) |
| द्वादशी | भद्रा | शुभ संस्कार व दान | वामन द्वादशी |
| त्रयोदशी | जया | साहस व प्रतियोगिता के कार्य | प्रदोष व्रत, धनतेरस |
| चतुर्दशी | रिक्ता | नए आरंभ टालें; साधना अत्यंत शक्तिशाली | शिवरात्रि, नरक चतुर्दशी |
| पूर्णिमा | पूर्णा | पूर्णता, दान व पूजन के लिए श्रेष्ठ | सत्यनारायण पूजा, गुरु पूर्णिमा |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
आज कौन सी तिथि है?
आज की तिथि षष्ठी (कृष्ण पक्ष) है — यह गणना पंचांग इंजन से नई दिल्ली के सूर्योदय के अनुसार होती है; ऊपर दिए कार्ड में अपने नगर का सजीव विवरण देखें। ध्यान रखें कि तिथि आधी रात को नहीं बदलती — जब चंद्रमा सूर्य से अगले 12° आगे बढ़ जाता है तब नई तिथि लगती है, इसलिए तिथि दिन के बीच में भी बदल सकती है। पंचांग सूर्योदय के समय सक्रिय तिथि को ही पूरे दिन की तिथि मानता है (उदय तिथि नियम)।
तिथि क्या है?
तिथि हिंदू पंचांग का चंद्र दिवस है — वह समय जो चंद्रमा को सूर्य से 12° आगे बढ़ने में लगता है। एक चंद्र मास में 30 तिथियाँ होती हैं: 15 शुक्ल पक्ष (अमावस्या से पूर्णिमा तक बढ़ता चंद्र) में और 15 कृष्ण पक्ष (पूर्णिमा से अमावस्या तक घटता चंद्र) में। तिथि पंचांग का सबसे मौलिक अंग है और पूजा, व्रत तथा संस्कारों के लिए इसी का प्रयोग होता है।
आज की तिथि का क्या अर्थ है?
आज की तिथि का अर्थ है हिंदू पंचांग का वर्तमान चंद्र दिवस। यह प्रतिदिन (और कभी-कभी एक ही दिन में) बदलती है, क्योंकि तिथि चंद्रमा की सटीक स्थिति पर आधारित है। आज की तिथि जानने से शुभ मुहूर्त, व्रत और दैनिक कार्यों के लिए उपयुक्त समय निर्धारित करने में सहायता मिलती है। पंचांग सूर्योदय के समय सक्रिय तिथि को उस दिन की तिथि मानता है (उदय तिथि नियम)।
कुल कितनी तिथियाँ होती हैं?
कुल 30 तिथियाँ होती हैं। 15 शुक्ल पक्ष की तिथियाँ हैं: प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा। 15 कृष्ण पक्ष की तिथियाँ भी यही नाम रखती हैं और अंत में पूर्णिमा के स्थान पर अमावस्या आती है।
नए कार्यों के लिए कौन सी तिथियाँ शुभ हैं?
तिथियों के 5 प्रकार हैं जिनके अलग गुण हैं: नंदा (1, 6, 11) — आनंददायक, उत्सव और नए कार्यों के लिए शुभ। भद्रा (2, 7, 12) — स्थिर, सभी संस्कारों के लिए शुभ। जया (3, 8, 13) — विजयी, बल की आवश्यकता वाले कार्यों के लिए उत्तम। रिक्ता (4, 9, 14) — नए आरंभ के लिए अशुभ पर देव-पूजा के लिए शक्तिशाली। पूर्णा (5, 10, 15/30) — पूर्ण और अत्यंत शुभ। रिक्ता तिथियों पर महत्वपूर्ण नए कार्य आरंभ करने से बचें।
शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में क्या अंतर है?
शुक्ल पक्ष (बढ़ता चंद्र) अमावस्या से पूर्णिमा तक की 15 तिथियों का काल है — विवाह, गृह प्रवेश और नए आरंभ जैसे शुभ कार्यों के लिए अधिक अनुकूल माना जाता है। कृष्ण पक्ष (घटता चंद्र) पूर्णिमा से अमावस्या तक का काल है — पूर्णता, पितृ पूजा और साधना से जुड़ा है। एकादशी सहित कई व्रत दोनों पक्षों में आते हैं।
तिथि कभी-कभी दिन में क्यों बदल जाती है?
तिथि ठीक 24 घंटे की नहीं होती — यह चंद्रमा को सूर्य से 12° आगे बढ़ने का समय है, जो औसतन लगभग 23.6 घंटे होता है। इसीलिए एक तिथि एक दिन देर से आरंभ होकर रात भर चल सकती है और अगले दिन जल्दी समाप्त हो सकती है। पंचांग सूर्योदय के समय सक्रिय तिथि को उस दिन की तिथि मानता है, इसलिए अलग देशांतर वाले दो नगरों की एक ही अंग्रेज़ी तारीख पर भिन्न तिथि हो सकती है।
पंचांग के पाँच अंग कौन-कौन से हैं?
पंचांग का अर्थ ही है 'पाँच अंग' — तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। तिथि चंद्रमा का सूर्य से 12° का कोणीय अंतर नापती है; वार सूर्योदय से सूर्योदय तक का सौर दिवस है (रवि से शनि); नक्षत्र बताता है चंद्रमा किस तारा-मंडल में है (कुल 27); योग सूर्य और चंद्रमा के देशांतरों का योग है (कुल 27); और करण तिथि का आधा भाग है (एक तिथि में दो करण, कुल 11)। इन पाँचों से किसी भी क्षण की शुभता तय होती है, और तिथि इनमें पहला व सबसे मौलिक अंग है।
क्षय और वृद्धि तिथि — कैलेंडर की सबसे रोचक गुत्थी
चंद्रमा की गति एक समान नहीं है — अपनी दीर्घवृत्तीय कक्षा में वह कभी तेज़ चलता है, कभी धीमा। इसी कारण दो विशेष स्थितियाँ बनती हैं। क्षय तिथि वह है जो किसी दिन के सूर्योदय को स्पर्श ही नहीं कर पाती — वह पिछले सूर्योदय के बाद शुरू होकर अगले सूर्योदय से पहले समाप्त हो जाती है, इसलिए उस वर्ष के कैलेंडर से वह तारीख मानो “लुप्त” दिखती है। वृद्धि तिथि इसका उल्टा है — एक ही तिथि दो लगातार सूर्योदयों को छू लेती है, इसलिए कैलेंडर में दो दिन एक ही तिथि दिखती है। परंपरा में क्षय तिथि को शुभ आरंभ के लिए सामान्यतः टाला जाता है, जबकि वृद्धि तिथि के दोनों दिनों में से पहले दिन को अधिक मान्यता दी जाती है — हालाँकि व्रत के मामले में नियम पंथ-परंपरा के अनुसार भिन्न हो सकते हैं।
हर तिथि का देवता — पूजन-परंपरा का आधार
शास्त्रीय परंपरा में प्रत्येक तिथि का एक अधिष्ठाता देवता माना गया है, और यही जोड़ बताता है कि कौन सा व्रत किस तिथि पर क्यों आता है। चतुर्थी के देवता गणेश हैं — इसीलिए संकष्टी और विनायक चतुर्थी उन्हीं को समर्पित हैं। एकादशी भगवान विष्णु की तिथि मानी गई है, त्रयोदशी और चतुर्दशी शिव से जुड़ी हैं — प्रदोष और शिवरात्रि इसी आधार पर हैं। अष्टमी दुर्गा और कृष्ण दोनों परंपराओं में विशेष है, नवमी देवी-आराधना की तिथि है, और पूर्णिमा चंद्रमा तथा सत्यनारायण पूजन से जुड़ी है। यह देवता-संबंध केवल कर्मकांड की सूची नहीं — यह उस परंपरागत दृष्टि का हिस्सा है जिसमें समय का हर खंड किसी दिव्य गुण का वाहक माना जाता है।
तिथि और करण — आधी तिथि का गणित
पंचांग के पाँच अंगों में करण सबसे कम समझा जाने वाला अंग है, जबकि उसका संबंध सीधे तिथि से है — एक करण तिथि का ठीक आधा भाग होता है, इसलिए हर तिथि में दो करण आते हैं और एक चंद्र मास में साठ करण। कुल ग्यारह करण हैं — सात चर (बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज, विष्टि) जो चक्र में घूमते रहते हैं, और चार स्थिर (शकुनि, चतुष्पद, नाग, किंस्तुघ्न) जो अमावस्या के आसपास निश्चित स्थान पर आते हैं। इनमें विष्टि करण — जिसे भद्रा भी कहा जाता है — शुभ कार्यों के लिए वर्जित माना गया है, और रक्षा बंधन जैसे पर्वों में “भद्रा टालकर” कार्य करने की परंपरा इसी से निकली है। तिथि देखने वाले के लिए करण उसकी सूक्ष्म परत है।
चंद्र मास और अधिक मास — तिथि-प्रणाली का संतुलन
तिथियों से बनने वाला चंद्र मास लगभग साढ़े उनतीस दिन का होता है, इसलिए बारह चंद्र मास सौर वर्ष से करीब ग्यारह दिन छोटे पड़ जाते हैं। यदि इसे यूँ ही छोड़ दिया जाता, तो कुछ वर्षों में त्योहार अपनी ऋतु से खिसक जाते — जैसा विशुद्ध चंद्र कैलेंडरों में होता है। हिंदू पंचांग इसे अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) से संतुलित करता है — जब किसी चंद्र मास में सूर्य की संक्रांति नहीं पड़ती, तो वह मास अतिरिक्त गिना जाता है और वर्ष में एक महीना जुड़ जाता है। परंपरा में अधिक मास को शुभ आरंभों के लिए सामान्यतः टाला जाता है, पर जप, दान और कथा-श्रवण के लिए विशेष पुण्यकारी माना गया है। यही संतुलन-प्रणाली सुनिश्चित करती है कि तिथि-आधारित पर्व अपनी ऋतु में ही लौटते रहें।
व्रत की तिथि बनाम मुहूर्त की तिथि — एक ही अंग, दो उपयोग
तिथि का उपयोग दो अलग प्रयोजनों से होता है, और दोनों के नियम अलग हैं — यह भेद न समझने से ही अधिकांश भ्रम पैदा होता है। व्रत-निर्णय में यह देखा जाता है कि व्रत के मुख्य पूजन-काल में कौन सी तिथि व्याप्त है — जैसे कुछ व्रतों में मध्याह्न-व्यापिनी तिथि मान्य है, कुछ में प्रदोष-काल की और कुछ में मध्यरात्रि की; इसीलिए कभी-कभी एक ही व्रत दो नगरों या दो पंचांगों में अलग दिन बताया जाता है। इसके विपरीत मुहूर्त-चयन में सूर्योदय-कालीन तिथि और कार्य के समय व्याप्त तिथि दोनों देखी जाती हैं। यह विविधता प्रणाली का दोष नहीं, उसकी सूक्ष्मता है — निर्णय सिंधु जैसे ग्रंथ इसी विषय को सुलझाने के लिए रचे गए।
तिथि प्रणाली पर और प्रश्न
क्षय तिथि क्या होती है और क्या वह अशुभ है?
क्षय तिथि वह तिथि है जो किसी भी सूर्योदय को स्पर्श नहीं करती — वह दो सूर्योदयों के बीच ही शुरू होकर समाप्त हो जाती है, इसलिए कैलेंडर से लुप्त दिखती है। परंपरा इसे नए शुभ आरंभ के लिए सामान्यतः टालती है, पर यह कोई दोष या संकट नहीं — केवल चंद्रगति की स्वाभाविक खगोलीय परिणति है।
वृद्धि तिथि में व्रत किस दिन रखा जाता है?
वृद्धि तिथि में एक ही तिथि दो लगातार सूर्योदयों को छूती है। सामान्य नियम पहले दिन को मान्यता देता है, पर व्रत के मामले में निर्णय उस व्रत के पूजन-काल से होता है — जिस दिन मुख्य पूजन-काल में तिथि व्याप्त हो, वही दिन लिया जाता है। इसीलिए पंथ-परंपरा के अनुसार उत्तर भिन्न हो सकता है।
एकादशी विष्णु की और चतुर्थी गणेश की तिथि क्यों मानी जाती है?
शास्त्रीय परंपरा में प्रत्येक तिथि का एक अधिष्ठाता देवता माना गया है — यही जोड़ व्रत-परंपरा का आधार है। एकादशी के देवता विष्णु हैं, चतुर्थी के गणेश, त्रयोदशी-चतुर्दशी शिव से जुड़ी हैं। इसी कारण उन तिथियों पर उन्हीं देवताओं के व्रत आते हैं।
करण क्या है और उसका तिथि से क्या संबंध है?
करण तिथि का ठीक आधा भाग है — हर तिथि में दो करण आते हैं। कुल ग्यारह करण हैं, जिनमें विष्टि करण (भद्रा) शुभ कार्यों के लिए वर्जित माना गया है। रक्षा बंधन जैसे पर्वों में भद्रा टालने की परंपरा इसी नियम से आई है।
अधिक मास क्या है और तिथियों से कैसे जुड़ा है?
बारह चंद्र मास सौर वर्ष से लगभग ग्यारह दिन छोटे पड़ते हैं, इसलिए जिस चंद्र मास में सूर्य की कोई संक्रांति नहीं पड़ती, उसे अधिक मास मानकर वर्ष में जोड़ा जाता है। इसी संतुलन से तिथि-आधारित त्योहार अपनी ऋतु में बने रहते हैं। अधिक मास जप-दान के लिए पुण्यकारी, पर नए आरंभ के लिए सामान्यतः वर्जित माना जाता है।
एक ही व्रत दो पंचांगों में अलग दिन क्यों दिखता है?
क्योंकि व्रत-निर्णय पूजन-काल में तिथि की व्याप्ति से होता है — कुछ व्रत मध्याह्न-व्यापिनी तिथि से, कुछ प्रदोष-काल से और कुछ मध्यरात्रि से तय होते हैं। स्थान के सूर्योदय-भेद और पंथ-परंपरा के नियम-भेद से एक ही व्रत का दिन बदल सकता है। यह प्रणाली की सूक्ष्मता है, त्रुटि नहीं।