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आज का पंचांग

नई दिल्ली का पंचांग — बुधवार, 4 नवंबर 2026

New Delhi में आज (बुधवार, 4 नवंबर 2026) का पंचांग: तिथि दशमी 11:04 तक, नक्षत्र पूर्व फाल्गुनी, सूर्योदय 06:35, सूर्यास्त 17:34, राहु काल 12:05–13:27 (IST)।

बुधवार, 4 नवंबर 2026

तिथि, नक्षत्र, योग, करण और राहु काल — New Delhi के लिए

सटीक वैदिक गणनाप्रतिदिन अद्यतन100% निःशुल्क

कोई भी शहर या गाँव: शहर वाले बॉक्स में उसका नाम लिखें।

तिथि
दशमीकृष्ण पक्ष · तिथि 1011:04 तक
नक्षत्र
03:30 (अगले दिन) तकचंद्रमा राशि में
सूर्योदय
06:35
सूर्यास्त
17:34
चंद्रोदय
01:47
चंद्रास्त
14:31
चंद्र राशि
सूर्य राशि
लग्न
पक्ष
कृष्ण पक्ष
इस पंचांग की गणना कैसे होती है?+
चुना हुआ स्थान
नई दिल्ली
गणना की तारीख
2026-11-04
स्थानीय समय क्षेत्र
Asia/Kolkata
गणना के निर्देशांक (अक्षांश, देशांतर)
28.6139, 77.209

यहाँ चुनी हुई तारीख के स्थानीय सूर्योदय पर लागू तिथि और नक्षत्र दिखाए गए हैं। ये दिन में बदल सकते हैं; समाप्ति का समय अगले बदलाव को दर्शाता है।

सूर्योदय और सूर्यास्त आपके स्थान पर निर्भर करते हैं। तिथि पूरी दुनिया में एक ही क्षण बदलती है, पर घड़ी का स्थानीय समय अलग होता है। इसलिए सूर्योदय पर लागू तिथि अलग-अलग स्थानों में भिन्न हो सकती है।

तिथि — चंद्र दिवस

सूर्य से चंद्रमा की कोणीय दूरी के हर 12° का अंतराल एक तिथि है। तिथि किसी भी समय शुरू या समाप्त हो सकती है; इसकी अवधि हमेशा 24 घंटे नहीं होती।

नक्षत्र — चंद्रमा की स्थिति

निरयन राशि चक्र को 27 बराबर भागों में बाँटा जाता है। सूर्योदय पर चंद्रमा जिस भाग में होता है, वही नक्षत्र यहाँ दिखाया जाता है।

गणना की विधि

सूर्य और चंद्रमा की स्थिति Swiss Ephemeris से निकाली जाती है। राशि और नक्षत्र के लिए लाहिड़ी अयनांश सहित निरयन राशि चक्र का उपयोग होता है। अयनांश सायन और निरयन स्थितियों के बीच का समायोजन है।

खगोलीय गणना और पारंपरिक मार्गदर्शन

खगोलीय स्थितियाँ और उदय-अस्त के समय खगोल गणना से आते हैं। राहु काल और शुभ मुहूर्त का निर्धारण इन समयों पर ज्योतिष के पारंपरिक नियम लागू करके होता है; ये व्यक्तिगत परिणामों की वैज्ञानिक भविष्यवाणी नहीं हैं।

समय की सीमाएँ

सूर्योदय या सूर्यास्त की गणना उपलब्ध न होने पर अनुमानित समय लिया जा सकता है। इस परिणाम में यह नहीं बताया जाता कि अनुमानित समय लिया गया है या नहीं। चंद्रोदय या चंद्रास्त का समय खाली होने का अर्थ है कि समय उपलब्ध नहीं है; इससे यह साबित नहीं होता कि उस दिन चंद्रमा का उदय या अस्त नहीं होता।

Swiss Ephemeris गणना संदर्भ
योग
Brahma08:01 तक
करण
Vishti

शुभ और अशुभ काल

राहु काल
12:05 – 13:27
यमगंड काल
07:58 – 09:20
गुलिक काल
10:42 – 12:05
ब्रह्म मुहूर्त ✓
04:59 – 05:47
अमृत काल ✓
21:05 – 22:41
अभिजित मुहूर्त ✓
11:43 – 12:27
ग्रह स्थिति+
☉
Sun
17.4°
☽
Moon
15.1°
♂
Mars
25.9°
☿
Mercury
18.7°वक्री
♃
Jupiter
0.5°
♀
Venus
0.6°वक्री
♄
Saturn
14.9°वक्री
☊
Rahu
1.7°वक्री
☋
Ketu
1.7°वक्री
संवत और काल गणनापराभव
संवत्सरपराभव (40/60)
अयनदक्षिणायन
ऋतुशरद
गोलYamya
सौर मासTula
संवतवर्षनववर्ष
विक्रम संवत2083Chaitra Shukla Pratipada
शक संवत1948Chaitra Shukla Pratipada
गुजराती संवत2082Kartika Shukla Pratipada
कलि संवत5128Chaitra Shukla Pratipada
बंगाब्द1433Mesha Sankranti (Pohela Boishakh)
दिशा, वास और काल विभाग
दिशा शूल (बचें)North
राहु वासNorth-East
चंद्र वासEast
अग्नि वासAakash
शिव वासSabha
आनंदादि योगSthira
दिनमान10.98 h
रात्रिमान13.03 h
मध्याह्न10:59 – 13:10
प्रातः संध्या05:51 – 06:35
सायं संध्या17:34 – 18:18
गोधूलि17:12 – 17:56
विजय मुहूर्त13:54 – 14:38
निशीथ मुहूर्त23:39 – 00:31
ताराबल और चंद्रबल15 नक्षत्र अनुकूल

अपना जन्म नक्षत्र और राशि नीचे देखें।

पंचकपंचक रहित

अनुकूल

नक्षत्र: Ashwini (Sampat), Krittika (Parama Mitra), Rohini (Mitra), Ardra (Sadhaka), Pushya (Kshema), Magha (Sampat), Uttara Phalguni (Parama Mitra), Hasta (Mitra), Swati (Sadhaka), Anuradha (Kshema), Moola (Sampat), Uttara Ashadha (Parama Mitra), Shravana (Mitra), Shatabhisha (Sadhaka), Uttara Bhadrapada (Kshema)

राशि: mithun, singh, tula, vrishchik, kumbh, meen

मिश्रित

नक्षत्र: Bharani (Janma), Purva Phalguni (Janma), Purva Ashadha (Janma)

राशि: mesh, kark, dhanu

प्रतिकूल

नक्षत्र: Mrigashira (Vadha), Punarvasu (Pratyari), Ashlesha (Vipat), Chitra (Vadha), Vishakha (Pratyari), Jyeshtha (Vipat), Dhanishta (Vadha), Purva Bhadrapada (Pratyari), Revati (Vipat)

राशि: vrishabh, kanya, makar

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क्या यह पंचांग सही था?

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पंचांग हिंदू काल-गणना की पारंपरिक प्रणाली है जो हर दिन की प्रकृति पाँच अंगों से बताती है: तिथि यानी चंद्र दिवस, वार यानी सप्ताह का दिन, नक्षत्र यानी चंद्रमा का नक्षत्र-स्थान, योग यानी सूर्य-चंद्र संयोग और करण यानी आधी तिथि। परंपरा इन पाँचों को मिलाकर पूजा, व्रत और शुभ कार्यों का समय चुनती है।

वैदिक समय शास्त्र

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सावधानी

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बीज मंत्र

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पंचांग क्या है?

पंचांग (शाब्दिक अर्थ "पाँच अंग") हिंदू कैलेंडर और पंचांगिका है। इसके पाँच अंग हैं: तिथि (चंद्र दिवस), नक्षत्र (चंद्र गृह), योग (सूर्य-चंद्र संयोग), करण (तिथि का आधा भाग), और वार (सप्ताह का दिन)। इसका उपयोग प्रतिदिन पूजा, संस्कार और महत्वपूर्ण कार्यों के लिए शुभ समय निर्धारित करने में किया जाता है।

दैनिक पंचांग देखना हिंदू परंपरा का अभिन्न अंग है। यह मुहूर्त (शुभ क्षण) चयन, पूजा करने, एकादशी जैसी विशेष तिथियों पर व्रत रखने और दिन के ग्रह प्रभावों को समझने में सहायक है। प्रतिदिन का योग (27 योगों में से एक) भी शुभ या अशुभ होता है — जैसे सिद्धि योग अत्यंत शुभ और व्यतीपात योग अशुभ माना जाता है।

हमारा पंचांग Swiss Ephemeris से चुने हुए स्थान और तारीख के लिए गणना करता है। तिथि और नक्षत्र स्थानीय सूर्योदय के अनुसार दिखाए जाते हैं। परिणाम के पास गणना की विधि खोलकर समय क्षेत्र, निर्देशांक और अनुमानित समय की सीमाएँ देखें। शुभ-अशुभ समय का अर्थ ज्योतिष की परंपरा पर आधारित है; यह व्यक्तिगत परिणाम की गारंटी नहीं है।

पंचांग के पाँच अंग — विस्तार से

पंचांग के पाँचों अंग मिलकर ही किसी दिन की पूरी तस्वीर बनाते हैं — कोई एक अंग अकेले शुभ या अशुभ नहीं होता। नीचे हर अंग का अर्थ, दैनिक जीवन में उसका महत्व, और वह किन कार्यों से जुड़ा है — यह समझाया गया है, ताकि ऊपर दिया गया आज का पंचांग आप स्वयं पढ़ सकें।

तिथि (चंद्र दिवस)

तिथि सूर्य और चंद्रमा के बीच 12 अंश के कोणीय अंतर से बनने वाला चंद्र दिवस है। एक चंद्र मास में 30 तिथियाँ होती हैं — शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से पूर्णिमा तक 15, और कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से अमावस्या तक 15।

दैनिक जीवन में महत्व: व्रत, पूजा और संस्कार अंग्रेज़ी तारीख से नहीं, तिथि से तय होते हैं — एकादशी व्रत, पूर्णिमा स्नान और अमावस्या तर्पण सब तिथि पर आधारित हैं। परंपरा तिथियों को पाँच वर्गों में बाँटती है: नंदा, भद्रा, जया, रिक्ता और पूर्णा — इसी से दिन की मूल प्रकृति समझ आती है।

किन कार्यों से जुड़ा है: जया तिथियाँ (तृतीया, अष्टमी, त्रयोदशी) महत्वपूर्ण शुरुआत के लिए और पूर्णा तिथियाँ (पंचमी, दशमी, पूर्णिमा) शुभ कार्यों की पूर्णता के लिए उत्तम मानी जाती हैं। रिक्ता तिथियों (चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी) पर परंपरा नए कार्य टालने की सलाह देती है।

नक्षत्र (चंद्र गृह)

नक्षत्र वह तारा-समूह है जिसमें चंद्रमा उस समय स्थित होता है। पूरा राशिचक्र 27 नक्षत्रों में बँटा है — प्रत्येक 13 अंश 20 कला का — और हर नक्षत्र का एक स्वामी ग्रह तथा एक देवता है।

दैनिक जीवन में महत्व: ज्योतिष में चंद्रमा मन का कारक है, इसलिए दिन का नक्षत्र उस दिन के मानसिक वातावरण की प्रकृति बताता है। मुहूर्त चयन में नक्षत्र सबसे अधिक भार रखता है — विवाह, गृह प्रवेश और नामकरण जैसे संस्कारों में सबसे पहले नक्षत्र ही देखा जाता है।

किन कार्यों से जुड़ा है: रोहिणी, पुष्य और हस्त जैसे नक्षत्र अधिकांश शुभ कार्यों के लिए श्रेष्ठ माने जाते हैं — पुष्य नक्षत्र खरीदारी और निवेश के लिए विशेष प्रसिद्ध है, हालाँकि विवाह के लिए वर्जित है। भरणी और अश्लेषा जैसे तीक्ष्ण नक्षत्रों में परंपरा सौम्य कार्य टालने का सुझाव देती है।

योग (सूर्य-चंद्र संयोग)

योग सूर्य और चंद्रमा के भोगांश (देशांतर) के जोड़ से बनता है — प्रत्येक 13 अंश 20 कला के जोड़ पर एक नया योग। कुल 27 योग हैं, जो विष्कुम्भ से शुरू होकर वैधृति पर पूर्ण होते हैं।

दैनिक जीवन में महत्व: योग दिन की सूक्ष्म गुणवत्ता का सूचक है — वही तिथि और नक्षत्र होने पर भी योग शुभ या अशुभ होने से दिन की प्रकृति बदल जाती है। इसीलिए विद्वान मुहूर्त निकालते समय तिथि-नक्षत्र के साथ योग अवश्य मिलाते हैं।

किन कार्यों से जुड़ा है: सिद्धि, अमृत, सौभाग्य और शुभ योग नए कार्य, यात्रा और मांगलिक कार्यों के लिए अनुकूल माने जाते हैं। व्यतीपात, वैधृति और परिघ जैसे योगों में परंपरा बड़े निर्णय और नई शुरुआत टालने की सलाह देती है — यह जप, दान और साधना का समय माना गया है।

करण (तिथि का आधा भाग)

करण तिथि का आधा भाग है — हर तिथि में दो करण होते हैं। कुल 11 करण हैं: 7 चर करण (बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज, विष्टि) जो चक्र में दोहराते हैं, और 4 स्थिर करण जो मास में एक ही बार आते हैं।

दैनिक जीवन में महत्व: करण दिन के आधे-आधे हिस्से की सूक्ष्म प्रकृति बताता है — इसी से पता चलता है कि दिन का कौन सा भाग किस काम के लिए अनुकूल है। सबसे महत्वपूर्ण है विष्टि करण, जिसे भद्रा कहा जाता है — परंपरा में भद्रा काल में शुभ कार्य वर्जित हैं।

किन कार्यों से जुड़ा है: वणिज करण व्यापार और लेन-देन के लिए अनुकूल माना जाता है, बव और बालव सामान्य शुभ कार्यों के लिए। भद्रा (विष्टि करण) में रक्षाबंधन जैसे पर्व तक टालकर मनाए जाते हैं — इसलिए बड़े काम से पहले करण देखना परंपरा का अभिन्न अंग है।

वार (सप्ताह का दिन)

वार सप्ताह का दिन है और पंचांग का पाँचवाँ अंग। ज्योतिष में हर वार का एक स्वामी ग्रह है — सोमवार का चंद्रमा, मंगलवार का मंगल, बुधवार का बुध, गुरुवार का गुरु, शुक्रवार का शुक्र, शनिवार का शनि और रविवार का सूर्य।

दैनिक जीवन में महत्व: वार का स्वामी ग्रह पूरे दिन पर अपनी छाप छोड़ता है — इसीलिए हर वार की पूजा, व्रत और उपाय अलग हैं। किसी ग्रह से जुड़ा उपाय उसी के वार पर करने की परंपरा है, जैसे शनि से जुड़े उपाय शनिवार को।

किन कार्यों से जुड़ा है: सोमवार शिव-पूजा और मानसिक शांति के कार्यों के लिए, मंगलवार हनुमान उपासना और साहसिक कार्यों के लिए, बुधवार व्यापार और लेखन के लिए, गुरुवार शिक्षा और विवाह-वार्ता के लिए, शुक्रवार कला और सुख-साधनों के लिए, तथा शनिवार सेवा और शनि शांति के लिए उपयुक्त माना जाता है।

आज का पंचांग कैसे पढ़ें — 6 सरल चरण

पंचांग पढ़ना कोई जटिल विद्या नहीं — क्रम पता हो तो कुछ ही क्षणों में आप दिन की प्रकृति समझ सकते हैं। परंपरागत क्रम यही है: तिथि → नक्षत्र → योग → करण → वार, और साथ में राहु काल तथा शुभ मुहूर्त की जाँच।

  1. 1. पहले तिथि और पक्ष देखें: ऊपर दिए गए आज के पंचांग में सबसे पहले तिथि और पक्ष पढ़ें — यही दिन की मूल प्रकृति है। एकादशी हो तो व्रत का दिन, रिक्ता तिथि हो तो नए कार्य के लिए सतर्कता, पूर्णा तिथि हो तो शुभ कार्यों के लिए अनुकूलता।
  2. 2. फिर नक्षत्र मिलाएँ: आज का नक्षत्र और उसका स्वामी ग्रह देखें। शुभ नक्षत्र (जैसे पुष्य, रोहिणी, हस्त) हो तो दिन महत्वपूर्ण कार्यों के लिए बल पाता है; तीक्ष्ण नक्षत्र हो तो सौम्य कार्य आगे के लिए रखें।
  3. 3. योग और करण जाँचें: व्यतीपात या वैधृति योग, अथवा विष्टि करण (भद्रा) चल रहा हो तो बड़े निर्णय और मांगलिक कार्य टालने की परंपरा है। सिद्धि या अमृत योग हो तो वही दिन शुभ आरंभ के लिए चुना जाता है।
  4. 4. राहु काल नोट करें: हर दिन का राहु काल सूर्योदय-सूर्यास्त के आधार पर बदलता है, इसलिए अपने शहर का समय ऊपर पंचांग में देखें। इस अवधि में नई शुरुआत टालना परंपरा है — पहले से चल रहे कार्य जारी रह सकते हैं।
  5. 5. शुभ समय में कार्य की योजना बनाएँ: अभिजीत मुहूर्त और शुभ चौघड़िया दिन के वे खंड हैं जिन्हें परंपरा नई शुरुआत के लिए अनुकूल मानती है। दिन के महत्वपूर्ण काम — हस्ताक्षर, यात्रा प्रारंभ, खरीदारी — इन्हीं खंडों में रखने का प्रचलन है।
  6. 6. अंत में वार के अनुसार पूजा-उपाय चुनें: वार का स्वामी ग्रह देखकर उस दिन की पूजा और उपाय तय करें — जैसे सोमवार को शिव अभिषेक, शनिवार को शनि से जुड़े दान। ध्यान रहे: पंचांग प्रवृत्तियाँ दर्शाता है, निश्चित परिणाम नहीं — व्यक्तिगत मुहूर्त के लिए अपनी कुंडली के अनुसार निर्णय श्रेष्ठ रहता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

तिथि और तारीख में क्या अंतर है?

तारीख (Date) ग्रेगोरियन (अंग्रेज़ी) कैलेंडर पर आधारित है जो सूर्य की गति पर निर्भर है। तिथि हिंदू पंचांग का अंग है जो सूर्य और चंद्रमा के कोणीय अंतर पर आधारित है। एक तिथि 19 से 26 घंटे की हो सकती है, इसलिए कभी-कभी एक दिन में दो तिथियाँ या एक तिथि दो दिनों में हो सकती है। पूजा, व्रत और संस्कारों के लिए तिथि का ही प्रयोग होता है।

शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष क्या हैं?

शुक्ल पक्ष (बढ़ता चंद्र) अमावस्या के बाद पूर्णिमा तक की 15 तिथियों का काल है। कृष्ण पक्ष (घटता चंद्र) पूर्णिमा के बाद अमावस्या तक का काल है। सामान्यतः शुक्ल पक्ष को नए कार्यों के लिए अधिक शुभ माना जाता है क्योंकि यह वृद्धि और प्रकाश का प्रतीक है। कृष्ण पक्ष तप, साधना और आंतरिक कार्यों के लिए उपयुक्त माना जाता है।

पंचांग प्रतिदिन क्यों देखना चाहिए?

पंचांग प्रतिदिन बदलता है क्योंकि ग्रह निरंतर गतिमान हैं। प्रत्येक दिन की तिथि, नक्षत्र, योग और करण भिन्न होते हैं, जिससे उस दिन की शुभ-अशुभ प्रकृति निर्धारित होती है। पंचांग देखने से आपको यह ज्ञात होता है कि कौन सा कार्य किस समय करना उचित है, किन तिथियों पर व्रत रखना है, और किन समयों से बचना है (जैसे राहु काल)।

पंचांग में शुभ मुहूर्त कैसे देखें?

पंचांग में शुभ मुहूर्त देखने के लिए पाँचों अंग एक साथ मिलाए जाते हैं — शुभ तिथि (जया या पूर्णा), अनुकूल नक्षत्र (जैसे पुष्य, रोहिणी, हस्त), शुभ योग (सिद्धि, अमृत) और भद्रा-रहित करण। साथ ही राहु काल की अवधि टाली जाती है। दिन के मध्य का अभिजीत मुहूर्त परंपरा में अधिकांश कार्यों के लिए सुरक्षित माना जाता है। विवाह जैसे बड़े संस्कारों के लिए कुंडली के अनुसार व्यक्तिगत मुहूर्त निकालने की परंपरा है।

राहु काल में क्या नहीं करना चाहिए?

परंपरा के अनुसार राहु काल में नई शुरुआत टाली जाती है — नया व्यापार, यात्रा प्रारंभ, बड़ी खरीदारी, विवाह-प्रस्ताव या कोई मांगलिक कार्य। पहले से चल रहे कार्य जारी रखने में दोष नहीं माना जाता। राहु काल की अवधि हर दिन और हर शहर के सूर्योदय-सूर्यास्त के अनुसार बदलती है, इसलिए अपने शहर का आज का पंचांग देखकर ही समय जानें।

भद्रा क्या है और भद्रा में कौन से कार्य वर्जित हैं?

भद्रा पंचांग के 11 करणों में से विष्टि करण का लोकप्रिय नाम है, जो हर तिथि-चक्र में बार-बार आता है। परंपरा में भद्रा काल में शुभ और मांगलिक कार्य वर्जित माने गए हैं — यहाँ तक कि रक्षाबंधन जैसे पर्व भी भद्रा समाप्त होने के बाद मनाए जाते हैं। आज भद्रा है या नहीं, यह ऊपर दिए गए आज के पंचांग में करण देखकर पता चलता है।

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