गुरु महादशा में गुरु अंतर्दशा: फल, अवधि और उपाय
गुरु महादशा की पहली अंतर्दशा स्वयं गुरु की होती है। जानिए बलवान और पीड़ित गुरु के फल, लग्न के अनुसार प्रभाव, करियर, संतान और शास्त्रीय उपाय।
एक नज़र में
- अंतर्दशा की अवधि
- 2 साल 1 महीना 18 दिन
- महादशा के कुल वर्ष
- 16
आपकी गुरु महादशा में गुरु अंतर्दशा कब है?
अपनी जन्म तिथि, समय और स्थान दर्ज करें: इस अंतर्दशा के शुरू और समाप्त होने की आपकी अपनी तिथियाँ दिखेंगी। दशा की तिथियाँ जन्म के क्षण में चंद्रमा की सटीक स्थिति से निकलती हैं, और चंद्रमा एक दिन में लगभग 13 अंश चलता है, इसलिए इस जाँच के लिए जन्म समय ज़रूरी है।
गुरु महादशा की नौ अंतर्दशाएँ: क्रम और अवधि
गुरु महादशा के 16 वर्ष नौ अंतर्दशाओं में बँटते हैं: पहली अंतर्दशा स्वयं गुरु की होती है, फिर विंशोत्तरी क्रम चलता है। गुरु की अंतर्दशा इस क्रम में पहली है और 2 साल 1 महीना 18 दिन चलती है। महादशा इसी से खुलती है और इसके बाद शनि की अंतर्दशा आती है।
| क्रम | अंतर्दशा | अवधि |
|---|---|---|
| 1 | गुरु (यह पृष्ठ) | 2 साल 1 महीना 18 दिन |
| 2 | शनि | 2 साल 6 महीने 12 दिन |
| 3 | बुध | 2 साल 3 महीने 6 दिन |
| 4 | केतु | 11 महीने 6 दिन |
| 5 | शुक्र | 2 साल 8 महीने |
| 6 | सूर्य | 9 महीने 18 दिन |
| 7 | चंद्र | 1 साल 4 महीने |
| 8 | मंगल | 11 महीने 6 दिन |
| 9 | राहु | 2 साल 4 महीने 24 दिन |
गुरु महादशा में गुरु अंतर्दशा की प्रत्यंतर दशाएँ
गुरु की यह अंतर्दशा आगे नौ प्रत्यंतर दशाओं में बँटती है, जो गुरु से ही शुरू होती हैं। हर प्रत्यंतर की अवधि = अंतर्दशा की अवधि × उस ग्रह के महादशा-वर्ष ÷ 120। यहाँ सबसे लंबी प्रत्यंतर शुक्र की (4 महीने 8 दिन) और सबसे छोटी सूर्य की (1 महीना 8 दिन) है।
| क्रम | प्रत्यंतर दशा | अवधि |
|---|---|---|
| 1 | गुरु | 3 महीने 12 दिन |
| 2 | शनि | 4 महीने 2 दिन |
| 3 | बुध | 3 महीने 19 दिन |
| 4 | केतु | 1 महीना 15 दिन |
| 5 | शुक्र | 4 महीने 8 दिन |
| 6 | सूर्य | 1 महीना 8 दिन |
| 7 | चंद्र | 2 महीने 4 दिन |
| 8 | मंगल | 1 महीना 15 दिन |
| 9 | राहु | 3 महीने 25 दिन |
अवधि 360 दिन के दशा-वर्ष से; कैलेंडर तिथियाँ इंजन 365.25 दिन के वर्ष से निकालता है।
उदाहरण: नमूना कुंडली में यह अंतर्दशा
हमारी काल्पनिक नमूना कुंडली (जन्म 1 जनवरी 1990, स्थानीय समय 10:30, नई दिल्ली) के लिए गणना इंजन ने गुरु महादशा में गुरु अंतर्दशा की तिथियाँ 18 जुलाई 2008 से 5 सितंबर 2010 निकाली हैं।
ये किसी व्यक्ति की तिथियाँ नहीं हैं; अपनी तिथियाँ ऊपर की जाँच में देखें।
विंशोत्तरी दशा में गुरु (बृहस्पति) की महादशा 16 वर्ष की होती है, और इसकी पहली अंतर्दशा स्वयं गुरु की होती है। इसकी अवधि 16 × 16 ÷ 120 के सूत्र से निकलती है, जो दो वर्ष और लगभग डेढ़ महीने बैठती है। इस समय महादशा और अंतर्दशा दोनों का स्वामी एक ही ग्रह है, इसलिए जन्मकुंडली में गुरु जिस भाव का स्वामी है और जिस भाव में बैठा है, उन्हीं विषयों के फल सबसे साफ़ दिखाई देते हैं। गुरु बलवान हो तो यह पूरी महादशा की अच्छी नींव बनती है; पीड़ित हो तो वही कमज़ोरी और स्पष्ट होकर सामने आती है। इसके बाद शनि की अंतर्दशा आती है, जो अधिक अनुशासन और धैर्य माँगती है, इसलिए इस अवधि में बनाई गई शिक्षा, संबंध और बचत की नींव आगे बहुत काम आती है।
बलवान गुरु होने पर शुभ फल
बृहत् पाराशर होरा शास्त्र के अनुसार यदि गुरु कर्क राशि में उच्च का हो, धनु या मीन में स्वराशि का हो, अथवा केंद्र या त्रिकोण में शुभ ग्रहों के साथ हो, तो इस अंतर्दशा में धन, मान-सम्मान और राजकृपा मिलती है। संतान सुख, घर में मांगलिक कार्य, वाहन और वस्त्र का लाभ, तथा देवता, ब्राह्मण और गुरुजनों के प्रति श्रद्धा बढ़ती है। उच्च शिक्षा, अध्यापन, परामर्श, विधि और धर्म से जुड़े कामों में प्रतिष्ठा बढ़ती है। विवाह योग्य व्यक्ति के लिए, विशेषकर स्त्री की कुंडली में जहाँ गुरु पति का कारक है, विवाह की बात आगे बढ़ सकती है।
पीड़ित गुरु और लग्न का प्रभाव
यदि गुरु मकर राशि में नीच का हो, अस्त हो, छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो, या राहु, शनि अथवा मंगल से पीड़ित हो, तो यही अवधि धन-हानि, बड़ों से मतभेद, संतान को लेकर चिंता और गलत संगति का कारण बन सकती है। जब गुरु दूसरे या सातवें भाव का स्वामी हो, तो वह मारक का काम कर सकता है और स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देना चाहिए; गुरु से जुड़े शारीरिक विषय यकृत, चर्बी और पाचन हैं। लग्न भी फल बदलता है। मेष, कर्क, सिंह, वृश्चिक, धनु और मीन लग्न में गुरु त्रिकोण या लग्न का स्वामी होकर प्रायः शुभ फल देता है। मिथुन और कन्या लग्न में वह दो केंद्रों का स्वामी होता है, जिससे केंद्राधिपति दोष लगता है और फल मिश्रित रहते हैं। वृषभ, तुला, मकर और कुंभ लग्न में गुरु तीसरे, छठे, आठवें, ग्यारहवें या बारहवें भाव का स्वामी होता है, इसलिए वहाँ लाभ के साथ खर्च, प्रतियोगिता या रुकावट भी आती है।
करियर, परिवार और शास्त्रीय उपाय
- करियर: पढ़ाई, शोध, शिक्षण, वित्तीय सलाह, न्याय और धार्मिक संस्थाओं से जुड़े काम आगे बढ़ते हैं।
- परिवार और धन: संतान से जुड़े निर्णय और घर के शुभ आयोजन इस समय होने की संभावना रहती है; स्थिर और परंपरागत निवेश अधिक फलदायी रहते हैं, जबकि अति-आशावाद में लिया गया बड़ा जोखिम हानि दे सकता है।
- शास्त्रीय उपाय: पराशर परंपरा में गुरु की अंतर्दशा के अशुभ फल शांत करने के लिए शिव सहस्रनाम का पाठ और स्वर्ण दान बताया गया है।
- जप और दान: गुरुवार को "ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः" का जप, चने की दाल, हल्दी और पीले वस्त्र का दान, तथा माता-पिता और शिक्षकों की सेवा लाभदायक मानी जाती है।
- रत्न: पुखराज उन्हीं लग्नों में उचित है जहाँ गुरु लग्न या त्रिकोण का स्वामी है; वृषभ, तुला, मकर और कुंभ लग्न में रत्न की बजाय दान और जप बेहतर है, तथा मिथुन और कन्या लग्न में पूरी कुंडली की जाँच के बाद ही निर्णय लें।
- समय: जिनका जन्म पुनर्वसु, विशाखा या पूर्वभाद्रपद नक्षत्र में होता है, उनका जीवन गुरु की महादशा से ही आरंभ होता है। जन्म के समय चंद्रमा उस नक्षत्र का जितना भाग पार कर चुका होता है, दशा का उतना ही भाग बीता माना जाता है, इसलिए यह पहली अंतर्दशा जन्म से पहले ही आंशिक या पूरी तरह बीत चुकी हो सकती है।