राहु महादशा में राहु अंतर्दशा: फल, सावधानियाँ और उपाय
राहु महादशा की पहली अंतर्दशा स्वयं राहु की होती है। जानिए कब यह अचानक उन्नति देती है, कब भ्रम और रोग, और इस काल के शास्त्रीय उपाय क्या हैं।
एक नज़र में
- अंतर्दशा की अवधि
- 2 साल 8 महीने 12 दिन
- महादशा के कुल वर्ष
- 18
आपकी राहु महादशा में राहु अंतर्दशा कब है?
अपनी जन्म तिथि, समय और स्थान दर्ज करें: इस अंतर्दशा के शुरू और समाप्त होने की आपकी अपनी तिथियाँ दिखेंगी। दशा की तिथियाँ जन्म के क्षण में चंद्रमा की सटीक स्थिति से निकलती हैं, और चंद्रमा एक दिन में लगभग 13 अंश चलता है, इसलिए इस जाँच के लिए जन्म समय ज़रूरी है।
राहु महादशा की नौ अंतर्दशाएँ: क्रम और अवधि
राहु महादशा के 18 वर्ष नौ अंतर्दशाओं में बँटते हैं: पहली अंतर्दशा स्वयं राहु की होती है, फिर विंशोत्तरी क्रम चलता है। राहु की अंतर्दशा इस क्रम में पहली है और 2 साल 8 महीने 12 दिन चलती है। महादशा इसी से खुलती है और इसके बाद गुरु की अंतर्दशा आती है।
राहु महादशा में राहु अंतर्दशा की प्रत्यंतर दशाएँ
राहु की यह अंतर्दशा आगे नौ प्रत्यंतर दशाओं में बँटती है, जो राहु से ही शुरू होती हैं। हर प्रत्यंतर की अवधि = अंतर्दशा की अवधि × उस ग्रह के महादशा-वर्ष ÷ 120। यहाँ सबसे लंबी प्रत्यंतर शुक्र की (5 महीने 12 दिन) और सबसे छोटी सूर्य की (1 महीना 19 दिन) है।
| क्रम | प्रत्यंतर दशा | अवधि |
|---|---|---|
| 1 | राहु | 4 महीने 26 दिन |
| 2 | गुरु | 4 महीने 10 दिन |
| 3 | शनि | 5 महीने 4 दिन |
| 4 | बुध | 4 महीने 18 दिन |
| 5 | केतु | 1 महीना 27 दिन |
| 6 | शुक्र | 5 महीने 12 दिन |
| 7 | सूर्य | 1 महीना 19 दिन |
| 8 | चंद्र | 2 महीने 21 दिन |
| 9 | मंगल | 1 महीना 27 दिन |
अवधि 360 दिन के दशा-वर्ष से; कैलेंडर तिथियाँ इंजन 365.25 दिन के वर्ष से निकालता है।
उदाहरण: नमूना कुंडली में यह अंतर्दशा
हमारी काल्पनिक नमूना कुंडली (जन्म 1 जनवरी 1990, स्थानीय समय 10:30, नई दिल्ली) के लिए गणना इंजन ने राहु महादशा में राहु अंतर्दशा की तिथियाँ 19 जुलाई 1990 से 31 मार्च 1993 निकाली हैं।
ये किसी व्यक्ति की तिथियाँ नहीं हैं; अपनी तिथियाँ ऊपर की जाँच में देखें।
विंशोत्तरी दशा में राहु की महादशा 18 वर्ष की होती है और इसकी पहली अंतर्दशा स्वयं राहु की होती है। इसी कारण राहु-राहु का काल पूरी महादशा की दिशा तय करने वाला माना जाता है। राहु छाया ग्रह है और शास्त्र के अनुसार यह जिस राशि में बैठता है उसके स्वामी की तरह और जिन ग्रहों से जुड़ता है उनकी तरह फल देता है, इसलिए इसका फल बहुत हद तक इस पर निर्भर करता है कि कुंडली में यह किस भाव में बैठा है, किस राशि में है, उस राशि का स्वामी कितना बलवान है और राहु के साथ कौन से ग्रह युति या दृष्टि से जुड़े हैं। एक ही दशा दो लोगों को बिल्कुल उलटे अनुभव दे सकती है।
शुभ फल कब मिलते हैं
- बृहत् पाराशर होरा शास्त्र के अनुसार राहु यदि केंद्र या त्रिकोण में हो, शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो और उसकी राशि का स्वामी बलवान हो, तो इस अंतर्दशा में धन-लाभ, पद-प्रतिष्ठा और शासन या बड़े संस्थानों से सहयोग मिलता है।
- तीसरे, छठे, दसवें और ग्यारहवें भाव में राहु को सामान्यतः अच्छा माना जाता है। ऐसे में व्यक्ति साहस से प्रतिस्पर्धा जीतता है, शत्रुओं पर भारी पड़ता है और नए या अपरंपरागत क्षेत्रों में तेज़ी से आगे बढ़ता है।
- विदेश यात्रा, दूर स्थान से आय, तकनीक, शोध और जनसंपर्क से जुड़े काम इस काल में विशेष रूप से फलते देखे जाते हैं।
कठिन फल कब दिखते हैं
राहु यदि आठवें या बारहवें भाव में हो, पाप ग्रहों से पीड़ित हो, या उसकी राशि का स्वामी निर्बल हो, तो शास्त्र इस अवधि में मानसिक बेचैनी, चोरी या धोखे का भय, विष या संक्रमण से जुड़े रोग, अपयश और परिवार में तनाव की चेतावनी देते हैं। ऐसे समय में व्यक्ति जल्दबाज़ी में बड़े निर्णय लेता है, सट्टे या शॉर्टकट की ओर खिंचता है और बाद में पछताता है। राहु भ्रम का कारक है, इसलिए बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए गए अवसरों, अनजान साझेदारों और बिना जाँचे दस्तावेज़ों से सावधान रहना इस काल की सबसे बड़ी सीख है। अनिद्रा, अकारण डर और नशे की प्रवृत्ति भी पीड़ित राहु के लक्षण माने जाते हैं।
कुंडली का आकलन और उपाय
फल का सही आकलन करने के लिए पहले राहु का भाव और राशि देखें, फिर उसका राशि-स्वामी किस भाव में और कितने बल के साथ है, यह देखें। राहु जिस ग्रह के साथ बैठा है, उसके गुण भी वह ग्रहण करता है। चंद्रमा के साथ राहु मन को अस्थिर कर सकता है, जबकि बलवान गुरु की दृष्टि उसकी नकारात्मकता को काफ़ी हद तक शांत कर देती है। इसके बाद गोचर में राहु और शनि की स्थिति से घटनाओं का समय मिलाया जाता है। नवांश में राहु की स्थिति भी फल की पुष्टि में सहायक होती है। राहु की शांति के लिए देवी दुर्गा की उपासना सबसे प्रचलित उपाय है। दुर्गा सप्तशती का पाठ, शनिवार को राहु के बीज मंत्र का जप, और काले तिल, कंबल या सरसों के तेल का दान किया जा सकता है। पाराशर इस अंतर्दशा के अशुभ फलों को शांत करने के लिए राहु के जप और दान का निर्देश देते हैं। दिनचर्या में अनुशासन, नशे से दूरी और हर बड़े निर्णय से पहले किसी अनुभवी व्यक्ति की सलाह, ये व्यावहारिक उपाय भी उतने ही प्रभावी हैं।