चंद्र महादशा में गुरु अंतर्दशा: फल, गजकेसरी और उपाय
चंद्र महादशा में गुरु अंतर्दशा के शास्त्रीय फल: धन, संतान, विवाह, शिक्षा और धर्म पर असर, गजकेसरी योग की भूमिका, कुंडली के बिंदु और सरल उपाय।
एक नज़र में
- अंतर्दशा की अवधि
- 1 साल 4 महीने
- महादशा के कुल वर्ष
- 10
आपकी चंद्र महादशा में गुरु अंतर्दशा कब है?
अपनी जन्म तिथि, समय और स्थान दर्ज करें: इस अंतर्दशा के शुरू और समाप्त होने की आपकी अपनी तिथियाँ दिखेंगी। दशा की तिथियाँ जन्म के क्षण में चंद्रमा की सटीक स्थिति से निकलती हैं, और चंद्रमा एक दिन में लगभग 13 अंश चलता है, इसलिए इस जाँच के लिए जन्म समय ज़रूरी है।
चंद्र महादशा की नौ अंतर्दशाएँ: क्रम और अवधि
चंद्र महादशा के 10 वर्ष नौ अंतर्दशाओं में बँटते हैं: पहली अंतर्दशा स्वयं चंद्र की होती है, फिर विंशोत्तरी क्रम चलता है। गुरु की अंतर्दशा इस क्रम में चौथी है और 1 साल 4 महीने चलती है। इससे पहले राहु की और इसके बाद शनि की अंतर्दशा आती है।
चंद्र महादशा में गुरु अंतर्दशा की प्रत्यंतर दशाएँ
गुरु की यह अंतर्दशा आगे नौ प्रत्यंतर दशाओं में बँटती है, जो गुरु से ही शुरू होती हैं। हर प्रत्यंतर की अवधि = अंतर्दशा की अवधि × उस ग्रह के महादशा-वर्ष ÷ 120। यहाँ सबसे लंबी प्रत्यंतर शुक्र की (2 महीने 20 दिन) और सबसे छोटी सूर्य की (24 दिन) है।
| क्रम | प्रत्यंतर दशा | अवधि |
|---|---|---|
| 1 | गुरु | 2 महीने 4 दिन |
| 2 | शनि | 2 महीने 16 दिन |
| 3 | बुध | 2 महीने 8 दिन |
| 4 | केतु | 28 दिन |
| 5 | शुक्र | 2 महीने 20 दिन |
| 6 | सूर्य | 24 दिन |
| 7 | चंद्र | 1 महीना 10 दिन |
| 8 | मंगल | 28 दिन |
| 9 | राहु | 2 महीने 12 दिन |
अवधि 360 दिन के दशा-वर्ष से; कैलेंडर तिथियाँ इंजन 365.25 दिन के वर्ष से निकालता है।
उदाहरण: नमूना कुंडली में यह अंतर्दशा
हमारी काल्पनिक नमूना कुंडली (जन्म 1 जनवरी 1990, स्थानीय समय 10:30, नई दिल्ली) के लिए गणना इंजन ने चंद्र महादशा में गुरु अंतर्दशा की तिथियाँ 18 जून 2096 से 18 अक्टूबर 2097 निकाली हैं।
ये किसी व्यक्ति की तिथियाँ नहीं हैं; अपनी तिथियाँ ऊपर की जाँच में देखें।
चंद्र महादशा में गुरु की अंतर्दशा चौथे क्रम पर आती है। इससे पहले चंद्र-राहु अंतर्दशा चलती है और इसके बाद चंद्र-शनि अंतर्दशा शुरू होती है। चंद्र के दस वर्ष और गुरु के सोलह वर्ष के अनुपात से यह लगभग एक वर्ष चार महीने की होती है। नैसर्गिक मैत्री में गुरु चंद्र को मित्र मानता है और चंद्र गुरु को सम। चंद्र मन, माता और भावनाओं का कारक है, और गुरु ज्ञान, धर्म, संतान और धन का। राहु अंतर्दशा की उलझन के बाद यह समय अक्सर मन को स्थिरता और दिशा देता है।
शास्त्रीय फल और जीवन पर असर
बृहत् पराशर होरा शास्त्र के अनुसार यदि गुरु केंद्र या त्रिकोण में, अपनी राशि या उच्च राशि में हो, तो चंद्र दशा में गुरु अंतर्दशा राजसम्मान, धन-वृद्धि, संतान सुख, वस्त्र और आभूषण की प्राप्ति, धार्मिक कार्य और मित्रों से सुख देती है। यदि गुरु छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो, नीच का हो, अस्त हो या पाप ग्रहों से पीड़ित हो, तो धन की हानि, परिवार के लोगों को कष्ट, गुरुजनों से मतभेद और मानसिक चिंता के फल बताए गए हैं। शिक्षण, परामर्श, बैंकिंग, कानून, चिकित्सा, धार्मिक कार्य, सामाजिक सेवा और दूध, जल या खाद्य पदार्थों से जुड़े व्यापार इस अवधि में आगे बढ़ सकते हैं। उच्च शिक्षा, विदेश में पढ़ाई या किसी गुरु से दीक्षा के अवसर भी आते हैं। विवाह योग्य लोगों के लिए, विशेषकर जहाँ गुरु सातवें भाव या उसके स्वामी से जुड़ा हो, विवाह की बात आगे बढ़ती है। संतान की इच्छा रखने वालों के लिए भी यह समय सहायक माना जाता है। अधिक आशावाद में ज़रूरत से ज़्यादा ख़र्च करने या बिना जाँचे भरोसा करने से बचें।
गजकेसरी योग और कुंडली के संकेत
जब गुरु चंद्र से केंद्र में, यानी पहले, चौथे, सातवें या दसवें स्थान पर हो, तो गजकेसरी योग बनता है। चंद्र महादशा में गुरु अंतर्दशा इस योग के फल को सक्रिय करने का स्वाभाविक समय है। ऐसे में यश, विद्वानों से संपर्क, सम्मानजनक पद और आर्थिक सुरक्षा के योग बनते हैं। पर यह तभी पूरा फल देता है जब दोनों ग्रह बलवान हों। कृष्ण पक्ष का क्षीण चंद्र या मकर राशि का नीच गुरु इस योग का असर काफ़ी घटा देता है। अपनी कुंडली में यह भी देखें कि गुरु किन भावों का स्वामी है और चंद्र से किस स्थान पर है। नीच, अस्त या राहु-केतु से युक्त गुरु फल में कमी या भ्रम लाता है। मेष, कर्क, वृश्चिक, धनु और मीन लग्न में गुरु प्रायः शुभ भावों का स्वामी होकर अच्छा फल देता है, और इसी समय चंद्र राशि से गुरु का गोचर घटनाओं का समय बताता है।
उपाय
- गुरुवार को गुरु मंत्र का जप और माता-पिता व शिक्षकों का सम्मान।
- गुरुवार को चने की दाल, हल्दी, पीले वस्त्र या पुस्तकों का दान।
- सोमवार को शिव पूजा और जल अर्पण, जो चंद्र को बल देता है।
- धार्मिक ग्रंथों का नियमित अध्ययन और किसी योग्य गुरु का मार्गदर्शन।