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सूर्य महादशा में केतु अंतर्दशा: फल, अवधि और उपाय

सूर्य महादशा में केतु की अंतर्दशा 4 महीने 6 दिन चलती है। पद, परिवार और स्वास्थ्य पर इसका असर, केतु की स्थिति से बदलते फल और शास्त्रीय उपाय जानें।

एक नज़र में

अंतर्दशा की अवधि
4 महीने 6 दिन
महादशा के कुल वर्ष
6

आपकी सूर्य महादशा में केतु अंतर्दशा कब है?

अपनी जन्म तिथि, समय और स्थान दर्ज करें: इस अंतर्दशा के शुरू और समाप्त होने की आपकी अपनी तिथियाँ दिखेंगी। दशा की तिथियाँ जन्म के क्षण में चंद्रमा की सटीक स्थिति से निकलती हैं, और चंद्रमा एक दिन में लगभग 13 अंश चलता है, इसलिए इस जाँच के लिए जन्म समय ज़रूरी है।

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दशा चंद्र की स्थिति से बनती है — सही समय ज़रूरी है।

सूर्य महादशा की नौ अंतर्दशाएँ: क्रम और अवधि

सूर्य महादशा के 6 वर्ष नौ अंतर्दशाओं में बँटते हैं: पहली अंतर्दशा स्वयं सूर्य की होती है, फिर विंशोत्तरी क्रम चलता है। केतु की अंतर्दशा इस क्रम में आठवीं है और 4 महीने 6 दिन चलती है। इससे पहले बुध की और इसके बाद शुक्र की अंतर्दशा आती है।

सूर्य महादशा की अंतर्दशाएँ और उनकी अवधि
क्रमअंतर्दशाअवधि
1सूर्य3 महीने 18 दिन
2चंद्र6 महीने
3मंगल4 महीने 6 दिन
4राहु10 महीने 24 दिन
5गुरु9 महीने 18 दिन
6शनि11 महीने 12 दिन
7बुध10 महीने 6 दिन
8केतु (यह पृष्ठ)4 महीने 6 दिन
9शुक्र1 साल

सूर्य महादशा में केतु अंतर्दशा की प्रत्यंतर दशाएँ

केतु की यह अंतर्दशा आगे नौ प्रत्यंतर दशाओं में बँटती है, जो केतु से ही शुरू होती हैं। हर प्रत्यंतर की अवधि = अंतर्दशा की अवधि × उस ग्रह के महादशा-वर्ष ÷ 120। यहाँ सबसे लंबी प्रत्यंतर शुक्र की (21 दिन) और सबसे छोटी सूर्य की (6 दिन) है।

सूर्य महादशा में केतु अंतर्दशा की प्रत्यंतर दशाएँ और उनकी अवधि
क्रमप्रत्यंतर दशाअवधि
1केतु7 दिन
2शुक्र21 दिन
3सूर्य6 दिन
4चंद्र11 दिन
5मंगल7 दिन
6राहु19 दिन
7गुरु17 दिन
8शनि20 दिन
9बुध18 दिन

अवधि 360 दिन के दशा-वर्ष से; कैलेंडर तिथियाँ इंजन 365.25 दिन के वर्ष से निकालता है।

उदाहरण: नमूना कुंडली में यह अंतर्दशा

हमारी काल्पनिक नमूना कुंडली (जन्म 1 जनवरी 1990, स्थानीय समय 10:30, नई दिल्ली) के लिए गणना इंजन ने सूर्य महादशा में केतु अंतर्दशा की तिथियाँ 13 मार्च 2092 से 19 जुलाई 2092 निकाली हैं।

ये किसी व्यक्ति की तिथियाँ नहीं हैं; अपनी तिथियाँ ऊपर की जाँच में देखें।

विंशोत्तरी दशा में सूर्य की छह वर्ष की महादशा के भीतर केतु की अंतर्दशा 4 महीने 6 दिन चलती है, जो सूर्य के 6 और केतु के 7 वर्षों के गुणनफल को 120 से भाग देने पर मिलती है। क्रम में यह बुध की अंतर्दशा के बाद आती है, और इसके बाद शुक्र की अंतर्दशा से सूर्य महादशा पूरी होती है। सूर्य पहचान, पद, पिता और राजसत्ता का कारक है, जबकि केतु वैराग्य, अलगाव, अचानक घटनाओं, पुराने कर्म और मोक्ष का ग्रह माना जाता है। दोनों नैसर्गिक शत्रु हैं। इसलिए यह छोटी अवधि अक्सर ऐसा समय बनती है जब व्यक्ति पद और मान से जुड़ी चीजों से मोहभंग महसूस करता है, या कोई जिम्मेदारी अचानक हाथ से छूट जाती है। इसे अचानक लाभ का समय मान लेना ठीक नहीं; फल कुंडली की स्थिति पर टिका है।

पाराशरी ग्रंथों में इस अंतर्दशा का फल

बृहत् पाराशर होरा शास्त्र में सूर्य महादशा में केतु की अंतर्दशा के लिए मानसिक पीड़ा, धन की हानि, राजकीय अप्रसन्नता, स्वजनों से विवाद और शत्रुओं से भय जैसे फल बताए गए हैं। यदि केतु लग्नेश के साथ हो या शुभ ग्रहों से दृष्ट हो, तो अंतर्दशा के आरंभ में कुछ सुख और संतोष भी मिलता है। सूर्य से केतु आठवें या बारहवें भाव में हो तो स्वास्थ्य और यात्रा में सावधानी अधिक जरूरी है। केतु जिस राशि में बैठा हो, उसके स्वामी के अनुसार फल देता है, इसलिए उस राशिपति की स्थिति, बल और दृष्टि को साथ में परखें। तीसरे, छठे और ग्यारहवें भाव में केतु साहस और शत्रु पर विजय दे सकता है।

जीवन के किन क्षेत्रों पर असर दिखता है

  • करियर: पद में अचानक बदलाव, अधिकारियों से मतभेद या किसी भूमिका से अलग होने की स्थिति; शोध, अध्यात्म और तकनीकी गहराई वाले काम में मन लगता है।
  • परिवार: स्वजनों से गलतफहमी और पिता के विषय में चिंता; बातचीत में कठोरता से बचें।
  • मन: बेचैनी, उदासीनता और अपने ही निर्णयों पर संदेह; ध्यान और साधना की ओर झुकाव भी इसी समय बढ़ता है।
  • स्वास्थ्य: ज्वर, चोट, फोड़े-फुंसी और आँखों की तकलीफ के प्रति सावधान रहें; छोटी चोट को भी अनदेखा न करें।

उपाय

परंपरा में केतु की शांति के लिए गणेश उपासना और केतु के बीज मंत्र "ॐ स्रां स्रीं स्रौं सः केतवे नमः" का जप बताया गया है। सूर्य के लिए सूर्योदय के समय अर्घ्य देना और आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करना उपयोगी है। कुत्तों को भोजन देना, कंबल या सात अनाज का दान और किसी संत या गुरु की सेवा केतु के लिए प्रचलित उपाय हैं। इस अवधि में बड़े पद त्याग, नौकरी छोड़ने या अचानक यात्रा का निर्णय जल्दबाजी में न लें। लहसुनिया रत्न पूरी कुंडली देखे बिना न पहनें। यह वैकल्पिक है और कुछ भी खरीदना आवश्यक नहीं; कोई भी रत्न पहनने से पहले ज्योतिषी से सलाह अवश्य लें। अवधि छोटी है, इसलिए धैर्य रखें; इस समय शुरू हुई उलझनें अक्सर शुक्र की अगली अंतर्दशा में सुलझने लगती हैं, यदि शुक्र कुंडली में सहायक हो।

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