शंख योग: पाँचवें और छठे भाव के स्वामी — नियम, फल और जाँच
शंख योग तब बनता है जब पाँचवें और छठे भाव के स्वामी परस्पर केंद्र में हों और लग्नेश बलवान हो। शास्त्रीय नियम, फल, बल और कुंडली में जाँचने का तरीका।
क्या आपकी कुंडली में शंख योग बनता है?
अपनी जन्म तिथि, समय और स्थान दर्ज करें: गणना इंजन आपकी कुंडली के ग्रहों की राशि और भाव निकालेगा, और यह जाँच उन पर इस पेज में बताया गया नियम लागू करके बताएगी कि यह योग बनता है या नहीं, और कौन सी शर्त पूरी हुई। यह योग लग्न से गिने भावों पर टिका है और लग्न लगभग हर दो घंटे में बदलता है, इसलिए जन्म समय ज़रूरी है।
शंख योग का वर्णन फलदीपिका और अन्य शास्त्रीय ग्रंथों में मिलता है। यह योग सदाचार, दीर्घायु, परिवार के सुख और समृद्धि से जुड़ा है। शंख को शुभता और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है, और इस योग का नाम भी उसी भाव को दर्शाता है।
शंख योग कैसे बनता है
शास्त्रों में इस योग के दो रूप बताए गए हैं। पहले रूप में, पाँचवें भाव का स्वामी और छठे भाव का स्वामी एक-दूसरे से केंद्र में हों — यानी दोनों के बीच पहला, चौथा, सातवाँ या दसवाँ भाव का संबंध हो — और साथ ही लग्न का स्वामी बलवान हो। दूसरे रूप में, लग्न का स्वामी और दसवें भाव का स्वामी चर राशि (मेष, कर्क, तुला, मकर) में हों और नौवें भाव का स्वामी बलवान हो।
शास्त्रों में बताए गए फल
शास्त्रों के अनुसार शंख योग वाला व्यक्ति धनी, सदाचारी, दयालु और धर्म के मार्ग पर चलने वाला होता है। उसे जीवनसाथी, संतान और परिवार का सुख मिलता है, वह शुभ कार्यों में रुचि रखता है और दीर्घायु होता है। ये फल सामान्य दिशा बताते हैं — वास्तविक परिणाम ग्रहों के बल और पूरी कुंडली पर निर्भर करते हैं।
योग को बल देने और घटाने वाली बातें
- लग्न का स्वामी बलवान न हो तो यह योग पूरा फल नहीं देता — यह इस योग की मुख्य शर्त है।
- योग बनाने वाले ग्रह स्वराशि, उच्च या मित्र राशि में हों तो फल स्पष्ट होते हैं।
- ये ग्रह नीच, अस्त या पाप ग्रहों से पीड़ित हों तो फल कमजोर हो जाते हैं।
- योग के ग्रहों की दशा-अंतर्दशा में इसके फल अधिक अनुभव होते हैं।
अपनी कुंडली में कैसे जाँचें
पहले अपने लग्न के अनुसार पाँचवें और छठे भाव के स्वामी पहचानें और गिनें कि वे एक-दूसरे से किस भाव में हैं। यदि दूरी पहली, चौथी, सातवीं या दसवीं है, तो पहली शर्त पूरी होती है। फिर लग्नेश का बल देखें — वह अपनी राशि, उच्च राशि या केंद्र-त्रिकोण में हो तो बलवान माना जाता है। दूसरे रूप के लिए लग्नेश, दशमेश और नवमेश की स्थिति देखें।
पारंपरिक उपाय
लग्नेश को बल देने के लिए उसी ग्रह के शास्त्रीय मंत्र का जप पारंपरिक रूप से किया जाता है। भगवान विष्णु की पूजा और शंख से जल अर्पण इस योग से जुड़ा प्रचलित उपाय है। परंपरागत रूप से कुछ लोग रत्न भी पहनते हैं; यह वैकल्पिक है, कुछ भी खरीदना आवश्यक नहीं। कोई भी रत्न पहनने से पहले ज्योतिषी से सलाह अवश्य लें और पूरी कुंडली की जाँच कराएँ।