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नीचभंग राजयोग: नीच ग्रह का दोष कब कटता है, नियम और फल

नीचभंग राजयोग के शास्त्रीय नियम जानें: नीच राशि या उच्च राशि का स्वामी केंद्र में कब भंग करता है, उदाहरण, वास्तविक फल और दशा में समय।

क्या आपकी कुंडली में नीचभंग राजयोग बनता है?

अपनी जन्म तिथि, समय और स्थान दर्ज करें: गणना इंजन आपकी कुंडली में यह योग जाँचेगा और बताएगा कि कौन से ग्रह, किस राशि और भाव में, इसका कारण हैं। यह योग लग्न से गिने भावों पर टिका है और लग्न लगभग हर दो घंटे में बदलता है, इसलिए जन्म समय ज़रूरी है।

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लग्न लगभग हर 2 घंटे में बदलता है — सही समय ज़रूरी है।

किस ग्रह का नीचभंग कौन करता है

इंजन की नीचभंग जाँच: हर ग्रह की नीच राशि, उस राशि का स्वामी और उस राशि में उच्च होने वाला ग्रह। इनमें से कोई लग्न या चंद्रमा से केंद्र में हो, तो इंजन नीचभंग मानता है।

नीच ग्रहनीच राशिउस राशि का स्वामीउस राशि में उच्च ग्रह
सूर्यतुलाशुक्रशनि
चंद्रवृश्चिकमंगल—
मंगलकर्कचंद्रगुरु
बुधमीनगुरुशुक्र
गुरुमकरशनिमंगल
शुक्रकन्याबुधबुध
शनिमेषमंगलसूर्य

“—” का अर्थ है कि उस राशि में कोई ग्रह उच्च नहीं होता (राहु-केतु की उच्च राशि पर मतभेद है, इसलिए उन्हें नहीं गिना गया)।

ऊपर की जाँच केवल ये दो नियम गिनती है (चंद्रमा भंग करने वाला हो तो केवल लग्न से)। लेख के बाकी नियम (उच्च राशि का स्वामी, दृष्टि, राशि परिवर्तन, नवांश) यह जाँच नहीं गिनती।

नीचभंग राजयोग का अर्थ है किसी नीच ग्रह के दोष का भंग होना, यानी उसकी कमज़ोरी का कट जाना। जब कोई ग्रह अपनी नीच राशि में हो, तो वह सामान्यतः अपने भाव और कारकत्व के फल ठीक से नहीं दे पाता। पराशरी ज्योतिष और फलदीपिका में कुछ विशेष स्थितियाँ बताई गई हैं, जिनमें यह नीचता निष्प्रभावी हो जाती है। कई बार ऐसा ग्रह संघर्ष के बाद ऊँचा पद, सम्मान और स्थिरता भी दिलाता है, इसलिए इसे राजयोग की श्रेणी में रखा गया है।

नीच राशियाँ, नीचभंग के नियम और उदाहरण

पहले यह जानना ज़रूरी है कि कौन ग्रह कहाँ नीच होता है: सूर्य तुला में, चंद्रमा वृश्चिक में, मंगल कर्क में, बुध मीन में, बृहस्पति मकर में, शुक्र कन्या में और शनि मेष में। फलदीपिका के अनुसार नीच ग्रह की नीचता तब भंग होती है, जब उस नीच राशि का स्वामी, या उस ग्रह की उच्च राशि का स्वामी, लग्न अथवा चंद्रमा से केंद्र में स्थित हो। इसी क्रम में एक और नियम मिलता है: जो ग्रह उस राशि में उच्च का होता है, वह लग्न या चंद्रमा से केंद्र में हो। परंपरा में कुछ और स्थितियाँ भी नीचभंग की मानी जाती हैं।

  • नीच ग्रह पर उसके राशि स्वामी की दृष्टि हो।
  • नीच ग्रह और उसके राशि स्वामी के बीच राशि परिवर्तन हो।
  • नीच ग्रह नवांश कुंडली में अपनी उच्च राशि में हो।
  • जितनी अधिक शर्तें एक साथ पूरी हों, भंग उतना ही प्रबल माना जाता है।

उदाहरण के लिए, मान लीजिए बृहस्पति मकर राशि में नीच का है। मकर का स्वामी शनि है, बृहस्पति की उच्च राशि कर्क का स्वामी चंद्रमा है, और मकर में उच्च होने वाला ग्रह मंगल है। अब यदि शनि या मंगल लग्न से या चंद्र राशि से पहले, चौथे, सातवें या दसवें भाव में हो, अथवा चंद्रमा स्वयं लग्न से केंद्र में हो, तो बृहस्पति का नीचभंग माना जाएगा। चंद्रमा के लिए चंद्र राशि से केंद्र की जाँच का कोई अर्थ नहीं, क्योंकि वह अपनी ही राशि से सदा पहले स्थान पर रहता है। यदि मंगल स्वयं बृहस्पति के साथ मकर में बैठा हो और यह स्थान लग्न से केंद्र हो, तो भंग और भी स्पष्ट हो जाता है।

फल, समय और आम भ्रांतियाँ

नीचभंग होने से ग्रह उच्च के समान नहीं हो जाता। इसका सही अर्थ यह है कि आरंभ में उस ग्रह से जुड़े विषयों में कठिनाई आती है, पर बाद में परिश्रम से स्थिति सुधरती है और कभी-कभी असाधारण उन्नति भी होती है। हर नीचभंग राजयोग का फल नहीं देता। फल इस पर निर्भर है कि वह ग्रह किस भाव का स्वामी है, किस भाव में बैठा है, अस्त तो नहीं है, और नवांश में उसकी स्थिति कैसी है। परिणाम प्रायः नीच ग्रह की दशा या अंतर्दशा में, तथा भंग करने वाले ग्रह की दशा में दिखाई देता है। यदि वह दशा जीवन में आए ही नहीं, तो योग कुंडली में रहते हुए भी कम अनुभव होता है।

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