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गुरु (Guru / Jupiter) · पुष्पराग

पुखराज (Yellow Sapphire) — गुरु (Guru / Jupiter) रत्न

क्यों धन आता है पर रुकता नहीं? क्यों विवाह में देरी हो रही है? क्यों संतान नहीं हो रही बिना किसी चिकित्सीय कारण के? वैदिक ज्योतिष में कमज़ोर गुरु इन क्षेत्रों में विस्तार और समृद्धि रोकता है। वैदिक उपाय: पुखराज (पुष्पराग), गुरु का रत्न।

पुखराज धारण विधि — संक्षिप्त जानकारी

संस्कृत नाम

पुष्पराग

ग्रह

गुरु (Guru / Jupiter)

धातु

22 कैरेट सोना

वज़न (रत्ती)

4 से 7 रत्ती (3.6–6.3 कैरेट)

दिन

गुरुवार — सूर्योदय के दो घंटे के भीतर

उंगली

दाहिने हाथ की तर्जनी (Index finger)

गुरु (Guru / Jupiter) बीज मंत्र

ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः (108 बार)

पुखराज कौन पहने?

पुखराज तब पहनते हैं जब गुरु लग्न स्वामी हो (धनु या मीन लग्न), गुरु नीच हो (मकर में), या गुरु महादशा चल रही हो। महिलाओं के लिए: गुरु पति का कारक है — विवाह में देरी होने पर पुखराज पहली सिफारिश है।

पुखराज किसे बलशाली बनाता है

धन, विवाह, संतान, ज्ञान, आध्यात्मिक वृद्धि, सौभाग्य, धर्म

धारण विधि — पुखराज कैसे पहनें

  1. बुधवार की रात पुखराज की अंगूठी को कच्चे दूध या गंगाजल में भिगोएं।
  2. गुरुवार को सूर्योदय पर पीले कपड़े पर उत्तर-पूर्व (ईशान) दिशा की ओर बैठें।
  3. थोड़ी हल्दी (हल्दी) अर्पण करें — गुरु की वस्तु।
  4. 108 बार जपें: ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः।
  5. दाहिने हाथ की तर्जनी (Index finger) में पहनें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न — पुखराज

पुखराज कौन पहन सकता है?

धनु और मीन लग्न के लिए पुखराज सबसे लाभकारी है। वृषभ और तुला लग्न के लिए योगकारक रत्न है। गुरु महादशा में विशेष लाभ। महिलाओं के लिए विवाह में देरी का मुख्य उपाय। मिथुन और कन्या लग्न के लिए सावधानी आवश्यक है।

क्या पुखराज विवाह में मदद करता है?

हाँ — गुरु महिला की कुंडली में पति का मुख्य कारक है। जब गुरु कमज़ोर हो (नीच, 6, 8 या 12वें भाव में, या पापग्रहों से पीड़ित), विवाह में देरी या वैवाहिक कष्ट होते हैं। पुखराज गुरु को बलशाली बनाकर इन बाधाओं को हटाता है।

पुखराज कितनी जल्दी परिणाम देता है?

पुखराज नवरत्नों में सबसे जल्दी परिणाम देने वाला रत्न है। अनुकूल कुंडली वाले अधिकांश लोग 7–10 दिनों में सकारात्मक बदलाव महसूस करते हैं। पूर्ण प्रभाव 40 दिनों में स्थिर होता है।

अन्य ग्रह रत्न देखें

स्रोत: बृहत् संहिता (वराहमिहिर, अध्याय 80), गर्ग होरा, होरा सार (पृथुयशस)।

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