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नक्षत्र आधारित वैदिक दशा

योगिनी दशा कैलकुलेटर

अपना 36 वर्ष का योगिनी दशा चक्र जानें — इस समय कौन सी योगिनी सक्रिय है, उसका स्वामी ग्रह कौन है, और बृहत् पाराशर होरा शास्त्र के अनुसार 108 वर्ष की पूरी समयरेखा।

बृहत् पाराशर होरा शास्त्रचंद्र नक्षत्र से गणना8 योगिनी, 36 वर्ष का चक्र

पता न हो तो छोड़ दें। लग्न पर आधारित फल के लिए सही समय चाहिए।

वैदिक ज्योतिष में 8 योगिनियों का महत्व

योगिनी दशा नक्षत्र-आधारित दशा प्रणालियों में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह 36 वर्षों में अपना पूरा चक्र समाप्त करती है, जिससे जीवन के महत्वपूर्ण मोड़ों और दशा परिवर्तनों का स्पष्ट बोध होता है।

आठ योगिनियां — स्वामी ग्रह और वर्ष

योगिनियों का क्रम और हर योगिनी की निश्चित अवधि:

आठ योगिनियां — स्वामी ग्रह और निश्चित अवधि
योगिनीस्वामी ग्रहवर्ष
मंगलाचंद्र1
पिंगलासूर्य2
धान्यागुरु3
भ्रामरीमंगल4
भद्रिकाबुध5
उल्काशनि6
सिद्धाशुक्र7
संकटाराहु8
कुल—36

सक्रिय योगिनी दशा कैसे समझें

1. प्रारंभिक योगिनी: जन्म के समय चंद्रमा के नक्षत्र से निर्धारित।

2. दशा का शेष भाग: नक्षत्र में चंद्रमा के भुक्त अंश से प्रथम दशा का शेष काल।

3. क्रमिक चक्र: 36 वर्षों के चक्र 108 वर्ष की आयु तक 3 बार दोहराए जाते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

वैदिक ज्योतिष में योगिनी दशा क्या है?

योगिनी दशा बृहत् पाराशर होरा शास्त्र में वर्णित आठ योगिनियों की दशा प्रणाली है। विंशोत्तरी के 120 वर्ष की तुलना में इसका कुल चक्र 36 वर्ष का होता है: मंगला (1 वर्ष, चन्द्र), पिंगला (2 वर्ष, सूर्य), धान्या (3 वर्ष, गुरु), भ्रामरी (4 वर्ष, मंगल), भद्रिका (5 वर्ष, बुध), उल्का (6 वर्ष, शनि), सिद्धा (7 वर्ष, शुक्र), और संकटा (8 वर्ष, राहु)।

प्रारंभिक योगिनी की गणना कैसे होती है?

जन्म के समय चंद्रमा के नक्षत्र संख्या में 3 जोड़कर 8 से भाग दिया जाता है: (नक्षत्र संख्या + 3) mod 8। शेषफल के अनुसार प्रारंभिक योगिनी निर्धारित होती है। नक्षत्र में चंद्रमा के भुक्त अंश से प्रथम योगिनी का भुक्त/भोग्य शेष निकाला जाता है।

योगिनी दशा विंशोत्तरी दशा से कैसे अलग है?

विंशोत्तरी दशा 120 वर्ष की है और इसमें नौ ग्रहों की महादशाएं आती हैं, इसलिए यह पूरे जीवन का विस्तृत खाका देती है। योगिनी दशा 36 वर्ष की है और 108 वर्ष की आयु में तीन बार दोहराई जाती है। इसकी अवधियां छोटी (1 से 8 वर्ष) होती हैं, इसलिए यह करियर, घर-परिवार और जीवन के ठोस बदलावों का समय अधिक स्पष्ट रूप से दिखाती है।

शुभ और अशुभ योगिनी कौन सी हैं?

मंगला (चन्द्र), धान्या (गुरु), भद्रिका (बुध) एवं सिद्धा (शुक्र) शुभ योगिनी मानी जाती हैं जो सुख, समृद्धि एवं आध्यात्मिक सिद्धि देती हैं। पिंगला (सूर्य), भ्रामरी (मंगल), उल्का (शनि) एवं संकटा (राहु) चुनौतीपूर्ण योगिनी मानी जाती हैं जिनमें संयम और वैदिक उपाय आवश्यक होते हैं।

क्या योगिनी दशा को विंशोत्तरी के साथ देखा जाना चाहिए?

हाँ, शास्त्रीय परंपरा में किसी भी बड़े निर्णय या घटना के समय-निर्धारण के लिए विंशोत्तरी और योगिनी दोनों दशाओं का मिलान किया जाता है। जब दोनों दशाएं एक ही शुभ संकेत दें, तो उस फल की संभावना अधिक प्रबल मानी जाती है।

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